Journal of Palaeosciences <p><span style="font-weight: 400;">The </span><span style="font-weight: 400;">Journal of Palaeosciences (previously published as The Palaeobotanist) is an international journal that has been disseminating knowledge and has served palaeobotanists worldwide for over 60 years with diversified and enhanced quality of content. It is an in-house journal of Birbal Sahni Institute of Palaeosciences, Lucknow, India. Since its inception in the year 1952 many thematic issues, proceeding volumes, and significant contributions have been published. Over the past two decades, the advancement in the techniques used in Palaeosciences, proxies, and software for climate and fossil studies have immensely increased and hence the journal was renamed to Journal of Palaeosciences (2021). Journal of Palaeosciences is published bi-annually.</span></p> Birbal Sahni Institute of Palaeosciences en-US Journal of Palaeosciences 2583-4266 Structural Geology Bhagwan Ghute Copyright (c) 2023 Journal of Palaeosciences 2023-07-14 2023-07-14 72 1 67 68 10.54991/jop.2023.1850 Fluid–rock interaction in the basement granitoids: A plausible answer to recurring seismicity <p><span style="font-weight: 400;">The Koyna–Warna Seismogenic Region in the western part of the Indian Subcontinent has been recognized as one of the most significant sites of Reservoir–Triggered–Seismicity (RTS) during the last five decades. The basement granitoids, overlain by the porous and vesicular Deccan Trap basalt, contain numerous interconnecting fractures which act as the ascending and descending pathways of fluid flow. As a result of this fluid flow along fractures, the host rock has been subjected to significant chemical alteration along with the subsequent formation of some new minerals at the expense of a few other pre–existing mineral phases. Mesoscopic observations followed by Optical microscopy in the core samples of the basement rocks upto 1.5 km depth retrieved from the borehole KBH1 near Rasati (about 4.7 km from the Koyna Dam) have revealed the presence of chlorite and the precipitation of calcite, whereas the bulk mineralogical XRD has reaffirmed the presence of chlorite, calcite along with illite at a certain depth. This entire secondary mineral assemblage resembles the propylitic kind of hydrothermal alteration at temperatures &lt; 350°C under acid–to–neutral solution conditions and also indicates water channelization up to the deeper level in the basement granitoids (&gt;1.5 km). In addition, the presence of the hydrophilic clay minerals along fault and fracture zones may be responsible for triggering the seismicity in the Koyna Seismogenic Region as their absorption of water reduces the shear strength of faults and their low frictional strength accelerates the fault weakening process causing the generation of slip surfaces. Thus, in addition to several seismotectonic features, fault geometry and existing stress pattern, the clay mineralisation along the pre–existing faults and fractures of the basement rocks may also be a factor behind the recurring seismicity in this region.</span></p> <p><span style="font-weight: 400;"><strong>सारांश</strong></span></p> <p>भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी भाग में स्थित कोयना-वारना भूकंपीय क्षेत्र को पिछले पांच दशकों में तैलाशय-विमोचित-भूकंपीयता (आरटीएस) के सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक माना गया है। सरंधी तथा पुटिकामय दक्कन विपाक्ष बेसाल्ट से आच्छादित आधार ग्रैनीटॉइड में बहुतायत में परस्पर जुडी हुई दरारें मौजूद हैं जो तरल के प्रवाह हेतु आरोही एवं अवरोही पथ के रूप में कार्य करती हैं। दरारों में इस तरल प्रवाह के परिमाणतः कुछ अन्य पहले से विद्यमान खनिज प्रावस्थाओं की जगह पर नैपथ्य शैल में महत्वपूर्ण रासायनिक परिवर्तन हुए जिनके उत्तरवर्ती कुछ नूतन खनिजों का निर्माण हुआ। रासती (कोयना बांध से लगभग 4.7 किमी दूर) के निकट वेधछिद्र (बोरहोल) KBH1 से प्राप्त 1.5 किमी गहराई तक आधार शैलों के क्रोड़ नमूनों में प्रकाशीय सूक्ष्मदर्शी के अनुगामी मध्याकार प्रेक्षणों से क्लोराइट की विद्यमानता एवं कैल्साइट के अवक्षेपण का पता चला है, जबकि अधिकांश खनिजविज्ञानसंबंधी एक्सआरडी ने एक निश्चित गहराई पर इलाइट के साथ क्लोराइट, कैल्साइट की मौजूदगी की पुष्टि की है। यह सम्पूर्ण द्वितीयक खनिज समुच्चय अम्ल से निष्प्रभावी विलयन स्थितियों के तहत &lt;350° सेल्सियस तापमान पर उष्ण जलीय परिवर्तन के प्रोफिलाईटी प्रकार से मेल खाता है तथा आधार ग्रैनीटॉइड (&gt;1.5 किमी) में गहरे स्तर तक पानी चैनलन की तरफ भी संकेत करता है। इसके अलावा, भ्रंश तथा दरार खंड के साथ जलरागी (हाइड्रोफिलिक) मृदा खनिजों की विद्यमानता कोयना भूकंपजन्य क्षेत्र में भूकंपीयता के प्रवर्तन हेतु जिम्मेदार हो सकती है क्योंकि उनके जल का अवशोषण भ्रंश की कटान क्षमता कम करती है तथा उनकी निम्न घर्षण क्षमता भ्रंश को कमजोर करने की प्रक्रिया को तेज कर देती है जिससे सर्पण सतहों की रचना होती है। इस प्रकार, कई भूकंपीय लक्षणों, भ्रंश ज्यामिति एवं मौजूदा प्रतिबल पैटर्न के अलावा, विद्यमान भ्रंश तथा आधार शैलों की दरारें तथा मृदा का खनिजीकरण भी इस क्षेत्र में आवर्ती भूकंपीयता का कारक हो सकता है।</p> Matsyendra Kumar Shukla Piyal Halder Kamlesh Kumar Anupam Sharma Copyright (c) 2023 Journal of Palaeosciences 2023-07-14 2023-07-14 72 1 1 8 10.54991/jop.2023.1853 Neoproterozoic Snowball Earth extent inferred from paleosols in California <p><span style="font-weight: 400;">Gelisol paleosols with sand wedges and sorted stone stripes are reported from the early Cryogenian (717–659 Ma), Surprise Diamictite Member and Sourdough Limestone Member of the Kingston Peak Formation in Redlands Canyon, western Panamint Range, California. The Surprise Diamictite was thus not entirely marine, although glaciomarine sediments and tectonically induced, mass wasting deposits, may be present in other parts of the Kingston Peak Formation. Sand wedge and stone stripe paleosols are evidence of local ice–free land with frigid continental climate at paleolatitude as low as 8 ± 4º from paleomagnetic studies of the Surprise Diamictite. The Sturt glaciation was a dramatic global cooling, but not a global snowball. Bare ground of landslides, alluvial fans, till and loess with mineral nutrients, and microtopographic shelter for complex life on land would have been important for survival of life on Earth from glacial destruction.</span></p> <p><span style="font-weight: 400;"><strong>सारांश</strong></span></p> <p>कैलिफ़ोर्निया में पश्चिमी पैनामिंट श्रेणी की रेडलैंड्स घाटी में किंग्स्टन पीक शैलसमूह के प्रारंभिक क्रायोजेनियन (717-659 मिलियन वर्ष) के दौरान सरप्राइज डायमिक्टाइट सदस्य तथा सौरडोह चूनापत्थर सदस्य से प्राप्त बालू फान (सैंड वेजेज़) एवं छटी हुई प्रस्तर धारियों सहित तुषारभूति पुरनिखात (गेलिसोलपेलियोसोल्स) मिले हैं । इस प्रकार सरप्राइज़ डायमिक्टाइट पूर्णतः समुद्री नहीं थे यद्यपि किंग्सटन पीक शैलसमूह के अन्य भागों में पहले समुद्री (ग्लेशियोमारिन) अवसाद एवं विवर्तनिक (टेक्टोनिक) रूप से प्रेरित, पिंड अपशिष्ट (वेस्टिंग) निक्षेप मौजूद हो सकते हैं। सरप्राइज डायमिक्टाइट के पुराचुंबकीय अध्ययनों से पता चलता है कि बालू फान (सैंड वेज) एवं छंटी हुई प्रस्तर (स्टोन स्ट्राइप) कम से कम 8 ± 4º के पुराउन्नतांश पर शीत महाद्वीपीय जलवायु के साथ स्थानीय हिम-मुक्त भूमि के प्रमाण हैं। स्टर्ट हिमाच्छादन नाटकीय भूमंडलीय शीतलन था, परंतु भूमंडलीय हिमकुंडक नहीं था। भूस्खलन सम्बन्धी अनावृत भूमि, जलोढ़ फैलाव, खनिज पोषक तत्वों से भरपूर जुताई तथा भूमि पर जटिल जीवन के लिए सूक्ष्मस्थलाकृतिक आश्रय, हिमनद विनाश के कारण पृथ्वी पर जीवन जीने के लिए महत्वपूर्ण रहे होंगे।</p> Gregory Retallack Copyright (c) 2023 Journal of Palaeosciences 2023-07-14 2023-07-14 72 1 9 28 10.54991/jop.2023.1851 Evidence of an early Permian palynomorphs in Ophiolitic Mélange of the Shyok Suture Zone, Eastern Karakoram, Ladakh, India <p>An Early Permian palynomorphs have been recorded for the first time from Ophiolitic Mélange of the Shyok Suture Zone, Eastern Karakoram, Ladakh, India. The characteristic taxa recorded in the assemblage are–<em>Caheniasaccites diffusus, Crescentipollenites korbaensis, Distriatites bilateris, Faunipollenites varius, Ibisporites diplosaccus, Lacinitriletes badamensis, Lahirites parvus, Lunatisporites sp., Parasaccites korbaensis, Platysaccus brevizonatus, Plicatipollenites trigonalis, Potonieisporites mutabilis, Primuspollenites levis, Rhizomaspora indica, Scheuringipollenites tentulus, Striatites subtilis, Striasulcites ovatus, Striatopodocarpites gondwanensis </em>and<em> Verticipollenites secretus.</em> The palynoflora recorded here reveals a typical early Permian age (Asselian–Sakmarian; 299.0–284.0 Ma) and affiliated to those described from the peninsular and extra–peninsular region of Lower Gondwana sediments of India as well as other core Gondwana continents. The study suggests that these palynomorphs were trapped remnants of the active continental margin of the Peri–Gondwanic Microcontinent/Kshiroda Plate that was cut off during subduction/integration processes between the Shyok–Suture–Zone of Ladakh and Karakoram Qiangtang Lhasa terrane and preserved in the Ophiolitic Mélange.</p> <p><strong>सारांश</strong></p> <p>भारत में लद्दाख के पूर्वी काराकोरम, के श्योक सीवन मंडल में स्थित ओफियोलिटिक मेलांज से पहली बार प्रारंभिक पर्मियन परागाणु संरूप अभिलिखित हुए हैं। समुच्चय में दर्ज किए गए विशेष टैक्सा जैसे <em>कैहेनियासैकसाइट्स डिफ्यूसस</em><em>, क्रिसेंटिपोलेनाइट्स कोरबेन्सिस, डिस्ट्रिएटाइट्स बिलाटेरिस, फौनिपोलेनाइट्स वेरियस, इबिस्पोराइट्स डिप्लोसैकस, लैकिनिट्रिलेटेस बैडामेंसिस, लाहिराइट्स पार्वस, लुनाटिसपोराइट्स </em>एसपी/प्रजाति<em>, पैरासैकसाइट्स कोरबेन्सिस, प्लैटिसैकस ब्रेविज़ोनेटस, प्लिकैटिपोलेनाइट्स ट्राइगोनलिस, पोटोनीस्पोराइट्स म्यूटाबिलिस, प्राइमसपोलेनाइट्स लेविस, राइज़ोमास्पोरा इंडिका, श्यूरिंगिपोलेनाइट्स टेंटुलस, स्ट्रिएटाइट्स सबटिलिस, स्ट्रियासुल्साइट्स ओवेटस, स्ट्रिएटोपोडोकार्पाइट्स गोंडवेनेंसिस </em>और<em> वर्टिसीपोलेनाइट्स सेक्रेटस</em> हैं। यहां पर अभिलेखित किये गए परागाणुपुष्पों से प्रारंभिक पर्मियन आयु (एसेलियन-सैकमेरियन; 299.0-284.0 मिलियन वर्ष पूर्व) का पता चलता है तथा जो भारत के निचले गोंडवाना अवसादों के साथ-साथ कोर गोंडवाना महाद्वीप क्षेत्र के प्रायद्वीपीय एवं अतिरिक्त-प्रायद्वीप क्षेत्र में वर्णित परागाणु पुष्प से सम्बंधित है। अध्ययन से पता चलता है कि यह परागाणुसंरूप (पैलीनोमोर्फ) पेरी-गोंडवानिक माइक्रोकॉन्टिनेंट/क्षीरोडा प्लेटों के सक्रिय महाद्वीपीय उपांत के अटके हुए अवशेष थे, जो लद्दाख के श्योक-सिवनी-जोन/क्षेत्र एवं काराकोरम कियांगतांग ल्हासा इलाके के मध्य सबडक्शन/एकीकरण प्रक्रियाओं के दौरान कट गए थे तथा ओफियोलिटिक मेलांज में संरक्षित थे।</p> Saurabh Gautam Ram Awatar Anupam Sharma Copyright (c) 2023 Journal of Palaeosciences 2023-07-14 2023-07-14 72 1 29 41 10.54991/jop.2023.1856 Diet of Indus Civilization: Reinterpretations from Multi–Site Stable Isotopic Mortuary Analysis <p><span style="font-weight: 400;">Several insights on the identification and mobility of the Indus Civilization were provided by previous researchers based on the results limited towards archaeological context. In this study, several such published data of Mortuary samples from the major urban centre of Harappa, the eastern frontier town of Farmana, and the post–urban necropolis at Sanauli are re–evaluated in context with the modern dental samples. The results are compared to the compositional signatures found within teeth from modern humans from the USA, East Asia, Mexico and Bulgaria, which is expected to show variance in their isotopic signature depending upon regional level precipitation and diet. The results from δ18O signatures from the Indus Valley point towards dependence on riverine water for drinking.</span></p> <p><span style="font-weight: 400;"><strong>सारांश</strong></span></p> <p>पूर्व में शोधकर्ताओं द्वारा सिंधु सभ्यता की पहचान एवं गतिशीलता पर अनेक अंतर्दृष्टियां प्रदान की गई जो पुरातात्विक संदर्भ तक सीमित परिणामों पर आधारित थीं। इस अध्ययन में, हड़प्पा के प्रमुख शहरी केंद्र, फरमाणा के पूर्वी सीमांत शहर तथा सनौली जैसे बड़े शहरों में स्थित शवगृह से एकत्रित नमूनों के प्रकाशित आंकड़ों का आधुनिक दंत नमूनों के संदर्भ में पुनर्मूल्यांकन किया गया है। परिणामों की तुलना संयुक्त राज्य अमेरिका, पूर्वी एशिया, मैक्सिको एवं बुल्गारिया में आधुनिक मानव के दांतों के भीतर पाए जाने वाले संरचनात्मक चिन्ह्कों से की गई है, जिससे उनके समस्थानिक चिन्ह्कों में भिन्नता दिखाई देने की उम्मीद की गई है, जो क्षेत्रीय अवक्षेपण तथा आहार पर निर्भर करता है। सिंधु घाटी से प्राप्त δ<sup>18</sup>O चिन्ह्कों के परिणामों से पेयजल हेतु नदी के पानी पर निर्भरता की तरफ संकेत होता है।</p> Prasanna K Copyright (c) 2023 Journal of Palaeosciences 2023-07-14 2023-07-14 72 1 55 58 10.54991/jop.2023.1855 Landuse-Landcover Mapping and Modelling in different Ecological regions of the Monsoon International School and Symposium – 2023 Trina Bose Anjali Trivedi Akash Srinivas Copyright (c) 2023 Journal of Palaeosciences 2023-07-14 2023-07-14 72 1 59 62 10.54991/jop.2023.1857 International Conference on Reconstructing the Human Population Histories of South Asia Using Archaeology and Genetics Aparna Dwivedi Bhavna Ahlawat Niraj Rai Copyright (c) 2023 Journal of Palaeosciences 2023-07-14 2023-07-14 72 1 63 65 10.54991/jop.2023.1861 Variation in Dynamics, Controls, and Impacts of Agulhas Leakage through Late Pleistocene: A Review <p><span style="font-weight: 400;">The Indian–Atlantic water exchange that occurs south of Africa, commonly known as the Agulhas Leakage, is a significant component of global ocean circulation. Apart from supplying warm, saline water to the South Atlantic, the Agulhas Leakage plays an essential role in the global thermohaline circulation. Variations in leakage cause changes in the strength of Atlantic meridional overturning and oscillations in the formation of North Atlantic Deep Water (NADW). This review paper attempts to understand better the dynamics of the Southern Hemisphere’s Agulhas Leakage based on various proxies. The first aspect of this paper concentrates on planktonic foraminifera and other proxies–based reconstruction of the strength of paleo Agulhas Leakage. Secondly, the emphasis would be placed on the controls of the Agulhas Leakage, its impact and its linkage with the Indian Summer Monsoon (ISM). The interactions between the fluctuating westerlies in the Southern Hemisphere, the Subtropical Front (STF) and the Indian Summer Monsoon may affect the variability of Agulhas Leakage. During glacial terminations and following interglacial periods, there is a notable intensification of leakage, which subsequently enhances the Atlantic Meridional Overturning Circulation (AMOC) and assumes a pivotal function in the global transportation of heat. By synthesizing current knowledge, this review highlights the need for further research to better understand and predict the ramifications of Agulhas Leakage in the face of a changing climate.</span></p> <p><span style="font-weight: 400;"><strong>सारांश</strong></span></p> <p>अफ्रीका के दक्षिण में होने वाले भारतीय-अटलांटिक जल विनिमय, जो मुख्यतया अगुलहास रिसाव के रूप में विख्यात है, भू-मंडलीय महासागर परिसंचरण का महत्वपूर्ण घटक है। दक्षिण अटलांटिक में कोष्ण (गर्म), लवण जल की आपूर्ति के अलावा, अगुलहास रिसाव भू-मंडलीय थर्मोहेलिन परिसंचरण में एक अहम भूमिका निभाता है। रिसाव में परिवर्तन, उत्तरी अटलांटिक गहरा जल (एनएडीडब्ल्यू) की रचना में अटलांटिक दक्षिणी परिवर्तित एवं स्पंदन की तीव्रता में बदलाव पैदा करता है। इस समीक्षा शोध पत्र से विभिन्न प्रतिपत्री के आधार पर दक्षिणी गोलार्ध के अगुलहास रिसाव की गतिशीलता को बेहतर ढंग से समझने का प्रयास करता है। इस शोधपत्र का पहला पक्ष पुरा-अगुलहास रिसाव की तीव्रता की पुनर्संरचना के लिए प्लवकीय फोरामिनिफेरा एवं अन्य प्रतिपत्रियों की भूमिका पर केंद्रित है। द्वितीय पक्ष में, अगुलहास रिसाव के नियंत्रण, इसके प्रभाव एवं भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून (आईएसएम) के साथ सम्बन्ध पर बल दिया गया है। दक्षिणी गोलार्ध, उपोष्णकटिबंधीय फ्रंट (एसटीएफ) एवं भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून में उतार-चढ़ाव वाली पछुआ हवाओं के बीच अन्योन्य- क्रिया अगुलहास रिसाव की परिवर्तनशीलता को प्रभावित कर सकती है। हिमनद समाप्ति के दौरान तथा अंतर-हिमनद युग ( इंटरग्लेशियल) के बाद, रिसाव में उल्लेखनीय तीव्रता देखने को मिलती है, जो बाद में अटलांटिक दक्षिणी परिवर्तित परिसंचरण/अटलांटिक मेरिडीओनाल ओवर टर्निंग सर्कुलेशन (एएमओसी) को बढ़ाती है और ऊष्मा के भू-मंडलीय परिवहन में एक अहम् भूमिका है। वर्तमान ज्ञान को संश्लेषित करके, यह समीक्षा बेहतर समझ हेतु भावी शोध की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।</p> Divya Verma Pawan Govil Brijesh Kumar Hidayatullah Khan Copyright (c) 2023 Journal of Palaeosciences 2023-07-14 2023-07-14 72 1 43 54 10.54991/jop.2023.1852